अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अर्थात् जिसने अज्ञानरूपी अन्धकार हे अन्धी हुई मेरी आंखों को ज्ञान रूपी काजल की रेखा से खोला है उस गुरु को मेरा नमस्कार है।
संस्कृत भाषा भारत की आत्मा के रूप में ,प्राण के रूप में धर्म एवं संस्कृति हैं। अनादिकाल से संस्कृत ही संस्कृति की वाहिका है।अतः संस्कृत हमारी सांस्कृतिक भाषा है।
अद्यतनसुभाषितम् कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोस्त्वकर्मणि।। अर्थात् श्रीकृष्ण अर्जुन...
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